Tuesday, November 6, 2018

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

यज़्द शहर में क़जारी युग के कई मकान अब भी अच्छी हालत में हैं.
इन्हीं में से एक है मशहूर लारिहा हाउस. उन्नीसवीं सदी में बनी ये इमारत फ़ारसी आर्किटेक्चर का शानदार नमूना है.
इसके बीचो-बीच आयताकार आंगन है. इमारत में गर्मी और सर्दी के मौसम के हिसाब से अलग-अलग हिस्से बने हैं.
इमारत को दो हिस्सों में बांटने का मक़सद है सर्दी में सूरज की गर्मी का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल और गर्मी में सूरज से दूरी.
बादगीर से होकर आने वाली हवा एक मेहराबदार ताखे से होकर गुज़रती है, जो इमारत के बेसमेंट तक जाती है.
तहख़ाने में वो चीज़ें रखी जाती हैं, जो जल्दी ख़राब हो सकती हैं. इस इमारत की 38 सीढ़ियों से उतर कर और गहराई में जाएं, तो सर्दी का एहसास होने लगता है.
इस हिस्से को सर्दाब यानी ठंडा पानी कहते हैं. यहां पर क़नात यानी नहरों से लाया गया पानी गुज़ारा जाता है.
ठंडी हवा और पानी मिल कर इस कोठरी को रेफ्रिजरेटर बना देते हैं. एक ज़माने में ऐसी कोठरियों में बर्फ़ रखी जाती थी.
आज जैसे क़नात सिस्टम पुराना पड़ गया है. वैसे ही ये बादगीर भी तकनीक की तरक़्क़ी की वजह से पुराने पड़ गए हैं. एसी ने इनकी जगह ले ली है.
यज़्द के पुराने बाशिंदे 85 बरस के अब्बास फ़रोग़ी कहते हैं कि उनके मुहल्ले के बहुत से लोगों ने नए अपार्टमेंट में अपना आशियाना बना लिया है.
फ़रोग़ी कहते हैं कि, 'पुराने घर या तो ख़ाली पड़े हैं, या बाहर से आए कामगारों-मज़दूरों को किराए पर चढ़ा दिए गए हैं. जो घर बड़े और अच्छी हालत में थे, उन्हें तेहरान और शिराज़ से आए रईसों ने ख़रीदकर उनमें होटल खोल दिए हैं.'
यज़्द के पुराने मुहल्ले कूचा हाना की रहने वाली मिसेज़ फ़ारुक़ी ने हाल ही में अपना घर बेचा है. वो कुछ ही दूर बने अपार्टमेंट में रहने लगी हैं.
मिसेज़ फ़ारुक़ी अक्सर पुराने दिनों को याद करती हैं.
वो कहती हैं कि, 'पहले सारे मुहल्ले के बच्चे एक जगह इकट्ठे होकर खेलते थे. लोग बादगीर के नीचे बैठकर चैन की सांस लिया करते थे. शाम के वक़्त वहीं पर खाना-पीना होता था. गप्पें लड़ाई जाती थीं.'
मिसेज़ फ़ारुक़ी के पुराने घर में रॉयय घदीम यानी 'पुराना ख़्वाब' नाम से होटल खोल दिया गया है.
मिसेज़ फ़ारुक़ी बताती हैं कि, 'मैं अब भी कभी-कभी अपने पुराने घर जाती हूं. वो अब अच्छा दिखता है. मुझे ख़ुशी है कि उसे सहेज कर रखा गया है.'
यूनेस्को ने 2017 में यज़्द शहर को विश्व धरोहर घोषित किया था.
इसके बाद कल्चरल हेरिटेज इंस्टीट्यूट ने इसे क़र्ज़ देना शुरू किया.
जिन लोगों ने यहां के पुराने घर ख़रीदे थे, वो इस मदद की बदौलत उनकी मरम्मत करके उनमें होटल खोलने लगे.
इससे पुराने मकान सहेजे जा सके. पर स्थानीय टूर एजेंसी चलाने वाले फ़रसाद ओस्तादान कहते हैं कि अब क़र्ज़ मिलना मुश्किल हो रहा है.
सरकार के पास पुरानी विरासत को सहेजने के लिए पैसे ही नहीं हैं.
फिर भी ओस्तादान को उम्मीद है कि यज़्द की ऐतिहासिक इमारतों को बचाया जा सकेगा.
ख़ास तौर से बादगीर को. वो बचपन के दिनों को याद कर के बताते हैं कि कभी वो अपने दादा के घर में बादगीर के नीचे लेट कर गर्मी की दोपहर बिताया करते थे.
ओस्तादान कहते हैं कि, 'वो दिन अलग ही थे. बादगीर से आती हवा आज के एसी जैसा एहसास कराती थी. हमें तो उन दिनों में पता ही नहीं था कि एसी क्या बला होती है.'
ओस्तादान कहते हैं कि, 'जब तक यहां सैलानी आते रहेंगे, हालात ठीक रहेंगे. पर्यटन से आने वाला पैसा, यहां की पुरानी इमारतों की मरम्मत और रख-रखाव में काम आता है.
यहां आने वाले सैलानियों को पुरानी इमारतों और बादगीर की फ़िक्र होती है. हमें भी इनका ख़याल रखना है. उम्मीद है कि हम इसमें कामयाब होंगे.'

Wednesday, October 3, 2018

अहिंसा दिवस पर 'जय जवान जय किसान' करते किसानों पर हिंसा की आंखों देखी

अक्टूबर. जब पूरा देश अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी और 'जय जवान, जय किसान' का नारा देने वाले लाल बहादुर शास्त्री का जन्मदिन मना रहा है, तब दिल्ली से सटे यूपी बॉर्डर पर अपनी मांगों के साथ आए हज़ारों किसानों पर पुलिस रबर की गोलियां, आंसू गैस के गोले चला रही थी.
कई बार सूखा झेल चुके इन किसानों पर पानी की तेज़ बौछार का इस्तेमाल किया गया ताकि ये लोग दिल्ली में न घुस सकें.
अपने साथियों के पैरों और हाथों से बहते खून को दिखाते ये किसान कहते हैं, ''चुनाव के वक़्त कर्ज़माफ़ी का वादा करते हैं, लेकिन बाद में भूल जाते हैं. किसानों के साथ मज़ाक बना रखा है. साढ़े चार साल हो गए. किसानों पर क़र्ज़ सरकार की ग़लत नीतियों की वजह से है. झूठ बोल के वोट हासिल किए. अगले चुनाव में कतई स्वीकार नहीं करेंगे. ये हम पर गोलियां चला रहे हैं.''
भारतीय किसान यूनियन के झंडे तले ये किसान अलग-अलग राज्यों से जुटे. यूपी बॉर्डर पर दिल्ली में घुसने का इंतज़ार करते ट्रैक्टरों में बैठी महिलाएं अपनी-अपनी भाषा में लगभग एक ही बात कहती हैं- क़र्ज़माफ़ी, बिजली का बिल, गन्ने का भुगतान और किए वादों को पूरा करो.
किसान यूनियन के राकेश टिकैत कहते हैं, ''लाठी, पानी और आंसू गैस के
इस रैली में आप किसी भी राज्य से आए किसान से उनकी मांगों के बारे में पूछें तो स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों का ज़िक्र ज़रूर करते हैं. अब से 14 बरस पहले 2004 में स्वामीनाथन की अध्यक्षता में 'नेशनल कमिशन ऑन फ़ॉरमर्स' बना था.
  • कम दाम में अच्छी क्वालिटी के बीज
  • किसानों के लिए ज्ञान चौपाल
  • महिला किसानों को क्रेडिट कार्ड
  • फ़सल उत्पादन मूल्य से 50 फ़ीसदी ज़्यादा दाम
  • वनभूमि को कृषि से इतर कामों के लिए कॉरपोरेट को न दें
  • एग्रिकल्चर रिस्क फंड बनाया जाएस्वामीनाथन आयोग की ये सिफारिशें अब तक सरकारी फाइलों में ही सीमित हैं. एक पांच सितारा होटल के सामने सड़क पर फुटओवर ब्रिज की परछाईं में किसानों की भीड़ सुस्ता रही है.
    सरकार ने किसानों के लिए किसान चैनल भी शुरू किया था. मैंने कई किसानों से ये सवाल किया कि किसान चैनल से कभी कोई मदद नहीं मिली? ज़्यादातर इस सवाल पर हँसते और गुस्साए हुए बोले, 'हां बड़ी मदद हो रई है चैनल से... 10 दिन से चल रहे हैं, तब तो किसी चैनल ने ना ली हमारी ख़बर.'
    प्रदर्शन में बैठे राकेश टिकैत कहते हैं, ''गन्ना भुगतान को 14 दिन में करने का वादा था. आठ महीने हो गए, कुछ न हुआ. 10 साल पुराने ट्रैक्टर बंद कर दिए हैं. देश के संगठन अलग हो सकते हैं, लेकिन सारे किसानों के मुद्दे एक ही हैं. अभी किसानों का दर्द है. भारत सरकार डॉक्टर है. इलाज के लिए आए हैं. दवाई लेने आए हैं, लेकिन दवाई नहीं मिल रही है. हमारी मांगें केंद्र सरकार से ज़्यादा है. आश्वासन चार साल से मिल रहे हैं, लेकिन काम नहीं हो रहा. सरकार कोई भी हो, ढंग का काम नहीं हो रहा.''न किसानों को रोकने के लिए क़रीब एक हज़ार सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं. हालांकि किसानों और सुरक्षाबलों की संख्या को लेकर दोनों ही पक्ष कोई सही तस्वीर सामने नहीं रखते हैं.
    राकेश टिकैत कहते हैं, ''संख्या का क्या है जी. हम कोई गिनने थोड़ी जा रहे हैं.'' सुरक्षाबलों की सही संख्या बॉर्डर पर बताने से ज़्यादातर अधिकारी बचते दिखे.
    लेकिन ये संख्या इतनी तो थी कि कुछ जगहों पर किसान कम और रेपिड एक्शन फोर्स या पुलिस के लोग ज़्यादा नज़र आ रहे थे.
    किसानों की इस रैली का मिज़ाज सुबह पुलिस की फायरिंग के बाद कुछ बदला. जो किसान अब तक अपनी मांगों को लेकर विरोध कर रहे थे, अब उनकी आवाज़ और बातों में आक्रोश था.
    मीडिया के कैमरों को देखते हुए वो ये कहने से ना चूकते- ये नेता हमारी बातें कर-करके दिल्ली पहुंच लेते हैं, लेकिन हमारी मांगों को सुनने के लिए हमें दिल्ली में नहीं आने देते, उल्टा हमारा ही खून बहाते हैं.
    मेरठ के एडीजी (ज़ोन) प्रशांत कुमार बताते हैं, ''यूपी पुलिस की ओर से कोई फायरिंग नहीं हुई है. दिल्ली पुलिस ने कुछ आंसू गैस के गोले छोड़े हैं, रबड़ बुलेट फायर किए गए हैं. कुछ किसानों का कहना है कि फायरिंग की गई है, जांच के बाद चीज़ें बेहतर तरीके से पता चलेंगी. किसानों के आरोपों की जांच की जाएगी.''
    जिन किसानों के पैरों में चोट आई है, वो अपने ज़ख़्मों के साथ उस फ्लाईओवर के नीचे लेटे हुए हैं, जो यूपी और दिल्ली को बांटती है. पुलिस की ओर से इलाज के लिए उठने की बात कहने पर किसान पुलिस पर गरजते नज़र आते हैं.
    हालांकि ज़मीन पर अन्न उगाने वाले किसानों की इस लड़ाई में बुनियादी फर्क पुलिस बैरिकेट्स के दोनों तरफ़ देखा जा सकता है. जहां एक तरफ़ सुबह से ड्यूटी कर रहे पुलिसवाले खाने की लाइन में लगे नज़र आते हैं और दूसरी तरफ़ टुकड़ियों में बैठे किसान अपने-अपने बस्ते से रोटी आचार निकालकर खा रहे थे.
इस आयोग ने किसानों की बेहतरी के लिए कुछ सिफारिशें की थीं, जिनका ज़िक्र संभवत: सिर्फ़ चुनावी मंचों पर हुआ. फ़सल उगाने वाले किसान के लिए ज़मीन पर हालात नहीं बदले.
गोले आंदोलन के प्रसाद हैं. किसी-किसी को नसीब होए है ये.''
जब ये हज़़ारों किसान दिल्ली के बॉर्डर पर रुके हुए थे, तब किसान यूनियन का एक प्रतिनिधि मंडल गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिल रहा था. ख़बर है कि सरकार और किसानों के बीच अहम मांगों को लेकर सहमति बन गई है. लेकिन एयरकंडीशन कमरों में हुई इन बैठकों की ख़बर सड़क पर बैठे हज़ारों किसानों को नहीं है. वो मुझ समेत कई पत्रकारों से उम्मीद भरी नज़रों से सवाल पूछते हैं- दिल्ली में कोई बात बनी कि नहीं?

Tuesday, September 11, 2018

बच्चा पढ़ाई में तेज़ होगा या नहीं, कैसे पता चलेगा?

पढ़ाई के मामले में हर बच्चा अलग होता है. कोई तेज़ होता है, तो किसी को समझने में वक़्त लगता है.
मज़े की बात ये है कि स्कूल में कौन सा बच्चा तेज़ होगा और कौन औसत से कम होगा, ये बात बच्चों के जीन पर निर्भर करती है. जीन के आधार पर ये भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कोई बच्चा प्राइमरी स्कूल में कैसा परफॉर्म करेगा, किस विषय में उसकी दिलचस्पी ज़्यादा होगी.
लेकिन, ये बात बहुत कम ही लोगों को पता है कि हमारे जीन्स की बनावट और माहौल का असर बच्चे की आगे के बर्ताव और पढ़ाई में वो कैसा रहेगा इस बात पर पड़ता है.
इसके लिए ब्रिटेन के छह हज़ार जोड़ी जुड़वां बच्चों की पढ़ाई पर रिसर्च की गई. पढ़ाई में उनके स्तर पर गहरी निगाह रखी गई. देखा गया कि जो बच्चे प्राइमरी स्कूल में अच्छा करते हैं, वो आगे की पढ़ाई में भी बेहतर होते हैं.
ये रिसर्च जुड़वां बच्चों पर इसलिए की गई क्योंकि बच्चों की पढ़ाई पर जेनेटिक्स के असर को गहराई से मापा जा सके. एक जैसे दिखने वाले जुड़वां बच्चों के 100 फ़ीसद जीन्स एक जैसे होते हैं.
वहीं, जो जुड़वां बच्चे एक जैसे नहीं दिखते, उनके औसत 50 फ़ीसद जीन्स एक जैसे होते हैं. अब एक जैसे दिखने वाले जुड़वां बच्चे अगर पढ़ाई में एक जैसे स्तर को हासिल करते हैं, तो साफ़ है कि उनके जीन्स का पढ़ाई पर असर होता है. और अगर उनकी पढ़ाई के स्तर में फ़र्क़ होता है, तो उसकी वजह भी बच्चों के डीएनए में फ़र्क़ हो सकती है.
अगर बच्चों का स्कूल का ग्रेड प्राइमरी से लेकर सेकेंडरी स्कूल तक एक जैसा ही रहता है, तो इसके पीछे बड़ी वजह बच्चों का जीन सीक्वेंस होता है.
बच्चों के पढ़ाई के स्तर में 70 फ़ीसद योगदान उनके डीएनए सीक्वेंस पर निर्भर करता है, तो 25 फ़ीसद उनके माहौल पर. बाक़ी का पांच फ़ीसद फ़र्क़ अलग-अलग दोस्तों और टीचर के होने से होता है.
अगर जुड़वां बच्चों के ग्रेड में बहुत उतार-चढ़ाव आया, तो इसकी बड़ी वजह ये रही कि उन जुड़वां बच्चों को पढ़ाई और रहन-सहन का अलग-अलग माहौल मिला.
आम तौर पर बच्चों की अच्छी या बुरी ग्रेड के लिए उनकी अक़्लमंदी के स्तर को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है. लेकिन, सच ये है कि बच्चे स्कूल में जो ग्रेड लाते हैं, उसकी सबसे बड़ी वजह उनके जीन्स यानी डीएनए सीक्वेंस होते हैं.
हाल के दिनों में पढ़ाई के जीन्स से ताल्लुक़ को लेकर जीनोम-वाइड एसोसिएशन स्टडीज़ ( ) की गई हैं. इन रिसर्च से ये पता चलता है कि छात्रों के कुछ ख़ास गुणों का ताल्लुक़ किस जीन से होता है. दिक़्क़त ये आई कि इस स्टडी से पढ़ाई से जिन जीन्स का ताल्लुक़ पाया गया, उनका असर महज़ 0.1 फ़ीसद था.
तो, एक और रिसर्च के ज़रिए बच्चों के जीनोम के पढ़ाई के स्तर से संबंध को मापा गया. इसे पॉलीजेनिक स्कोर कहते हैं. इसके आधार पर आज ये बताया जा सकता है कि कोई बच्चा स्कूल में कैसा परफॉर्म करेगा.
ख़ास तौर से ऐसे बच्चों के ग्रेड की तुलना हो सकती है, जिनका एक-दूसरे से कोई ताल्लुक़ नहीं है.
इस पॉलीजेनिक स्कोर की मदद से उन छह हज़ार जुड़वां बच्चों की पढ़ाई के पूर्वानुमान लगाए गए. ये पूर्वानुमान जुड़वां लोगों के बारे में तुलनात्मक अध्ययन नहीं थे. बल्कि, इनके ज़रिए ये पता लगा कि दो अलग-अलग बच्चों के स्कूल में ग्रेड में कितना फ़र्क़ हो सकता है.
फिर उनकी सेकेंडरी एजुकेशन का ग्रेड कैसा रहने वाला है. इस पॉलीजेनिक स्कोर से एक बात तो साफ़ हो गई कि एक जैसे जीन वाले बच्चों की पढ़ाई में उपलब्धि कमोबेश एक जैसी ही आती है.
इस रिसर्च का एक बड़ा फ़ायदा ये हो सकता है, कि उन बच्चों की शुरुआत में ही मदद हो जाए, जो पढ़ाई में कमज़ोर रहने वाले हैं. आगे चलकर पॉलीजेनिक स्कोर और बच्चों के इर्द-गिर्द के माहौल की पड़ताल कर के ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि किस बच्चे को पढ़ाई में मदद की दरकार होगी. फिर उन्हें पढ़ाई में बेहतर करने के लिए ख़ास मदद मुहैया कराई जा सकती है.
हम डीएनए टेस्ट की मदद से बच्चों की पैदाइश के वक़्त ही पता लगा सकते हैं कि कोई बच्चा स्कूल की पढ़ाई में कैसा रहेगा. फिर शुरुआत से ही उस पर ज़्यादा ध्यान दिया जा सकेगा. पढ़ाई में कमज़ोर बच्चों की शुरू से ही मदद कर के उन्हें ज़िंदगी में आगे चल कर कामयाब बनाया जा सकता है.